Article 3 of Indian Constitution

अनुच्छेद 3 क्या कहता है?

हेलो फ्रेंड्स स्वागत है आप सबका Sabgyan.in के website में मैं अनुराग राज हूं आपक  सामने भारतीय संविधान का अनुच्छेद नंबर तीन लेकर यानी की इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन का आर्टिकल नंबर तीन हम लोगों ने ऑलरेडी दो और एक कंप्लीट कर लिए हैं l आप देख रहे हैं पूरे संविधान के जो 395 आर्टिकल हैं सब पर हम चर्चा कर रहे हैं आज का आर्टिकल संविधान के भाग एक यानी की संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र से संबंधित है उसी का एक अंग है जिसका अनुच्छेद नंबर तीन हम देखेंगे अनुच्छेद 3 में कौन-कौन सी बातें दी गई हैं अनुच्छेद 3 भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद है जो भारत के राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित है। यह संसद को अधिकार देता है कि वह राज्यों की सीमाओं को बदल सकती है, नए राज्य बना सकती है या दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है। इसका मूल उद्देश्य भारत के संघीय ढांचे को समय-समय पर जरूरतों के अनुसार लचीले रूप से ढालने की अनुमति देना है।

अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को निम्नलिखित कार्य करने का अधिकार है:

किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन करना

किसी राज्य को विभाजित करना।

दो या अधिक राज्यों को मिलाना।

किसी राज्य का नाम बदलना

 नए राज्य का निर्माण करना।

 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश – समझ और अंतर

जैसा कि आपने आर्टिकल 1 में पढ़ा था, भारत दो हिस्सों में बंटा होता है – राज्य और केंद्र शासित प्रदेश। जैसे यूपी, एमपी, बिहार ये भारत के राज्य हैं, वहीं दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्र केंद्र शासित प्रदेश हैं। जब हम “भारत के राज्य क्षेत्र” की बात करते हैं, तो इसका मतलब सिर्फ राज्यों से नहीं, बल्कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर पूरे भारत के भू-भाग से होता है। अब अगर किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं में बदलाव करना हो, या उनका नाम बदलना हो, तो यह काम अनुच्छेद 3 के तहत किया जाता है। यानी अनुच्छेद 3 के तहत संसद को यह अधिकार है कि वह भारत के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं में बदलाव कर सके या उनका नाम बदल सके।

अनुच्छेद 2 और 3 में अंतर

अगर आप अनुच्छेद 2 को याद करें, तो वहाँ बताया गया है कि भारत में कोई नया राज्य जो अभी भारत का हिस्सा नहीं है, उसे शामिल कैसे किया जा सकता है। यानी अनुच्छेद 2 का इस्तेमाल तब होता है जब कोई बाहरी क्षेत्र या देश भारत में जोड़ा जाए। वहीं अनुच्छेद 3 की बात करें, तो यह उन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा है जो पहले से ही भारत का हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि अनुच्छेद 3 के तहत भारत के मौजूदा राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों की सीमाएं बदली जा सकती हैं, नए राज्य बनाए जा सकते हैं, या उनके नाम बदले जा सकते हैं। यही बात अनुच्छेद 3 के अलग-अलग हिस्सों (क्लॉज़) में विस्तार से बताई गई है कि संसद को यह सब करने का अधिकार कैसे और किन शर्तों पर मिलता है।

संसद को अधिकार – राष्ट्रपति नहीं

अब ध्यान से समझिए – अनुच्छेद 3 के अनुसार, भारत में किसी भी राज्य की सीमाओं में बदलाव या नए राज्य बनाने का अधिकार संसद को दिया गया है, न कि राष्ट्रपति को। इसका मतलब यह है कि यह काम सिर्फ भारतीय संसद ही कर सकती है, वो भी कानून (विधि) बनाकर।

संसद क्या-क्या कर सकती है?

1. किसी राज्य के क्षेत्र का एक हिस्सा अलग कर सकती है।

2. दो या दो से ज्यादा राज्यों या उनके हिस्सों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।

3. किसी एक राज्य का हिस्सा निकालकर किसी दूसरे राज्य में मिला सकती है।

साधारण भाषा में समझिए: मान लीजिए भारत के नक्शे में एक राज्य है – जैसे उत्तर प्रदेश। संसद चाहे तो उत्तर प्रदेश का कुछ हिस्सा अलग करके एक नया राज्य बना सकती है (जैसे पहले उत्तराखंड बनाया गया)। या फिर दो राज्यों के कुछ हिस्सों को मिलाकर भी नया राज्य बना सकती है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये सब काम सिर्फ संसद के जरिए कानून बनाकर ही हो सकते हैं, कोई और संस्था या व्यक्ति ये नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 3: राज्यों की सीमाओं और संरचना में बदलाव का अधिकार

मान लीजिए भारत के नक्शे में कुछ राज्य ऐसे हैं जिनकी सीमाएं एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं। अब अगर कभी ज़रूरत पड़ जाए कि किसी राज्य का कोई हिस्सा दूसरे राज्य में जोड़ा जाए — या दो राज्यों को मिलाकर एक नया राज्य बनाया जाए — तो ये काम अनुच्छेद 3 के तहत ही किया जाता है।
  • इसमें संसद को ये अधिकार दिया गया है कि:

  1.  किसी राज्य के क्षेत्र को काटकर कोई नया राज्य बना सकती है।
  2. दो राज्यों या उनके हिस्सों को मिलाकर एक नया राज्य बना सकती है।
  3. एक राज्य के हिस्से को दूसरे राज्य में मिला सकती है।
  4. राज्यों के नाम या सीमाएं बदल सकती है l
ध्यान दें: ये काम सिर्फ संसद कर सकती है, वो भी कानून बनाकर। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या कोई और व्यक्ति अपने भाषण में कह देने से ऐसा नहीं हो सकता।

नाम और सीमाओं में परिवर्तन के उदाहरण

अब ज़रा ध्यान से समझिए – जब भी भारत में किसी राज्य की सीमा बदलनी हो, नया राज्य बनाना हो, किसी राज्य का नाम बदलना हो, या कोई हिस्सा काटकर दूसरा राज्य बनाना हो — ये सारा काम अनुच्छेद 3 के तहत होता है। इस प्रक्रिया में लोकसभा और राज्यसभा यानी संसद मिलकर कानून (विधि) बनाती है। राष्ट्रपति इस काम को खुद नहीं करते, बल्कि संसद के पास ही इसका पूरा अधिकार होता है।

1. राज्य का क्षेत्र बढ़ा सकती है – जैसे अगर किसी राज्य की सीमा में और इलाका जोड़ना हो।

2. राज्य का क्षेत्र घटा सकती है – जैसे किसी राज्य का हिस्सा काटकर नया राज्य बनाना।

उदाहरण:
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से, छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से , झारखंड को बिहार से अलग किया गया था।

3. राज्य की सीमाएं बदल सकती है – यानी राज्य की बाउंड्री में बदलाव किया जा सकता है।

4. नया राज्य बना सकती है – पुराने राज्यों के हिस्सों से।

5. राज्य का नाम बदल सकती है –

उदाहरण:
बॉम्बे का नाम महाराष्ट्र
मैसूर का नाम कर्नाटक
मद्रास का नाम तमिलनाडु
पांडिचेरी का नाम पुडुचेरी किया गया।
इन सारे बदलावों के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह संविधान के अनुच्छेद 3 में साफ-साफ बताई गई है।

राज्य बनाने या सीमाएं बदलने की प्रक्रिया (अनुच्छेद 3 के तहत)

जब भारत में किसी नए राज्य का निर्माण करना हो, किसी राज्य का नाम या सीमा बदलनी हो – तो इसके लिए एक ठीक-ठाक प्रक्रिया होती है, जो संविधान के अनुच्छेद 3 में बताई गई है। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं:

पहला कदम – राष्ट्रपति की सिफारिश

सबसे पहले, अगर किसी राज्य की सीमा में बदलाव करना है या नया राज्य बनाना है, तो इसकी शुरुआत राष्ट्रपति से होती है। राष्ट्रपति एक प्रस्ताव (Proposal) या अध्यादेश (Draft Bill) जारी करता है। उदाहरण के तौर पर: जैसे जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बनाया गया — ठीक वैसे ही कोई और राज्य भी बदला जा सकता है। अब राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं:

1. सीधा संसद को भेज दें प्रस्ताव।

2. या फिर पहले उस राज्य की विधानसभा से राय (Opinion) ले लें जिसमें बदलाव किया जा रहा है।

राज्य की विधानसभा से राय लेना

अगर किसी राज्य को बांटना है या उसका नाम बदलना है, तो बेहतर यही माना जाता है कि पहले वहां की विधानसभा से राय ले ली जाए। क्यों? ताकि कोई विवाद, झगड़ा या असहमति न हो। हालांकि, यह राय ज़रूरी नहीं है — चाहे राज्य की विधानसभा ‘हाँ’ कहे या ‘ना’, इसका असर संसद के फैसले पर नहीं पड़ता। मतलब, राष्ट्रपति चाहे तो राय मांगे, चाहे तो नहीं – लेकिन अंत में प्रस्ताव संसद में ही जाएगा।

संसद में कानून पास होना जरूरी

जब राष्ट्रपति प्रस्ताव संसद में भेजता है, तो वह:
पहले राज्यसभा में जाता है,
फिर लोकसभा में भेजा जाता है।
अगर दोनों सदनों में यह पास हो जाता है, तो इसे माना जाता है कि राष्ट्रपति ने भी अपनी सहमति दे दी — क्योंकि शुरुआत में उन्होंने ही प्रस्ताव लाया था। इसके बाद नए राज्य का निर्माण, नाम परिवर्तन या सीमा बदलाव लागू हो जाता है। इसमें ज्यादा देरी नहीं लगती।

अगर राष्ट्रपति किसी राज्य की विधानसभा से राय मांगता है, तो वह एक तय समय (जैसे 15 दिन) देता है — उस समय में राज्य को ‘हाँ’ या ‘ना’ में जवाब देना होता है।

सारांश
शुरुआत राष्ट्रपति करता है चाहे तो विधानसभा से राय ली जाती है लेकिन अंतिम निर्णय संसद का होता है संसद में बिल पास होते ही बदलाव लागू हो जाते हैं

क्या भारत अपना क्षेत्र किसी दूसरे देश को दे सकता है

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है – क्या भारत अपने देश का कोई हिस्सा किसी दूसरे देश को दे सकता है? इसका जवाब है: हाँ भी और नहीं भी – यानी Yes and No both अब यह थोड़ा confusing लग सकता है, तो चलिए इसे अच्छे से समझते हैं।

“हाँ” कैसे सही है?

भारत अपना कोई भी क्षेत्र दूसरे देश को दे सकता है, लेकिन ऐसा सीधा-सीधा अनुच्छेद 3 के तहत नहीं किया जा सकता। इसके लिए भारत को संविधान में संशोधन (Amendment) करना पड़ता है। यानी यह काम सिर्फ संसद में कानून बनाकर नहीं, बल्कि संविधान बदलकर ही किया जा सकता है। उदाहरण के लिए: 1950 के बाद भारत ने बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के साथ एक समझौता किया जिसमें कुछ सीमा क्षेत्र बांग्लादेश को दिया गया। ऐसा संविधान संशोधन करके किया गया — इसे हम “119वां संविधान संशोधन” कहते हैं। “नहीं” क्यों कहा जाता है? अनुच्छेद 3 सिर्फ भारत के अंदर राज्यों की सीमाएं बदलने की बात करता है — यानि एक राज्य से दूसरा राज्य बनाना, सीमाएं घटाना-बढ़ाना, नाम बदलना वगैरह। लेकिन अगर बात किसी बाहरी देश को क्षेत्र देने की हो — तो अनुच्छेद 3 काम नहीं आता, बल्कि संविधान संशोधन (जैसे अनुच्छेद 368) जरूरी होता है।

आर्टिकल 368 की जरूरत कब पड़ती है?

जब भी हमें संविधान में कोई बड़ा बदलाव करना होता है — जैसे कोई हिस्सा दूसरे देश को देना — तो सिर्फ साधारण कानून (Normal Law) से काम नहीं चलता। इसके लिए हमें संविधान में संशोधन (Amendment) करना होता है, और ये काम आर्टिकल 368 के तहत होता है।

आर्टिकल 368 के तहत क्या होता है?

1. संविधान में बदलाव करना होता है। 2. ये कोई आम कानून की तरह पास नहीं होता। 3. इसके लिए संसद में विशेष बहुमत (Special Majority) चाहिए: यानी लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है।

साधारण बहुमत vs विशेष बहुमत

काम का प्रकार किस आर्टिकल से होता है कितनी वोटिंग चाहिए? भारत के अंदर राज्य की सीमाएं, नाम या क्षेत्र बदलना अनुच्छेद 3 साधारण बहुमत (50% हाँ) भारत का हिस्सा किसी दूसरे देश को देना अनुच्छेद 368 विशेष बहुमत (2/3)
बेरूबारी मामला – एक ऐतिहासिक उदाहरण
भारत और पाकिस्तान के बीच बेरूबारी नामक क्षेत्र को लेकर विवाद हुआ था। भारत यह हिस्सा पाकिस्तान को देना चाहता था। इस पर बहस छिड़ गई – कुछ लोग कहने लगे भारत अपना हिस्सा क्यों दे! राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी “क्या हम अनुच्छेद 3 के तहत ऐसा कर सकते हैं?” सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया: नहीं! आप भारत का हिस्सा सिर्फ आर्टिकल 3 से नहीं दे सकते। इसके लिए आपको संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।” फिर क्या हुआ? 1960 में 9वां संविधान संशोधन (9th Amendment) किया गया। इसके ज़रिए बेरूबारी क्षेत्र पाकिस्तान को सौंपा गया।

बांग्लादेश सीमा समझौता – 100वां संविधान संशोधन (2015)

भारत और बांग्लादेश के बीच बहुत समय से सीमा को लेकर समस्याएं थीं। कुछ गाँव और इलाके ऐसे थे जिन्हें “जीत जैग” (Enclaves) कहा जाता है — मतलब एक देश के अंदर दूसरे देश के छोटे-छोटे टुकड़े। इससे लोग बहुत परेशान थे, क्योंकि: उन्हें यह समझ ही नहीं आता था कि वे भारत में हैं या बांग्लादेश में। पुलिस, स्कूल, बिजली जैसी सुविधाएं ठीक से नहीं मिलती थीं। सीमा पर अक्सर घुसपैठ और झगड़े होते रहते थे।

क्या किया गया?

भारत और बांग्लादेश ने मिलकर तय किया कि: हम सीमा रेखा (Boundary Line) को सीधा और साफ़ करेंगे। एक-दूसरे के अंदर के ये “घुसे हुए क्षेत्र” एक-दूसरे को सौंप देंगे। इस समझौते को पूरा करने के लिए भारत ने 2015 में संविधान में 100वां संशोधन किया।

क्या बदला?

कुल मिलाकर 111 छोटे क्षेत्र (Enclaves) का आदान-प्रदान हुआ। भारत को 51 क्षेत्र मिले, जबकि बाकी बांग्लादेश को दे दिए गए। बेशक भारत ने थोड़ा ज्यादा क्षेत्र बांग्लादेश को दिया, लेकिन इसके बदले में स्थायी शांति और स्पष्ट सीमा मिल गई।

फायदे क्या हुए?

भारत-बांग्लादेश के बीच की सीमा स्पष्ट और पक्की हो गई। सीमा पर रहने वाले लोगों की नागरिकता की समस्या हल हो गई। घुसपैठ, अपराध और भ्रम जैसी समस्याओं पर रोक लगी।

सारांश में समझें:

जब सीमा के बाहर के क्षेत्रों को दूसरे देश को देना होता है, तो हमें संविधान संशोधन (जैसे 100वां संशोधन) करना पड़ता है। यह काम अनुच्छेद 368 के तहत होता है, न कि सामान्य कानून या अनुच्छेद 3 के तहत। बांग्लादेश समझौता इसका बड़ा उदाहरण है — जिसमें भारत ने अपने कुछ क्षेत्र देकर बड़ी समस्या का शांतिपूर्ण हल निकाला।

निष्कर्ष

📜 अनुच्छेद 3 संसद को राज्यों की सीमाओं, नामों और निर्माण में परिवर्तन का अधिकार देता है। 🏛️ यह प्रक्रिया राष्ट्रपति के आदेश पर नहीं बल्कि संसद के विधायी निर्णय पर आधारित होती है। 🔍 अनुच्छेद 2 और 3 में अंतर: अनुच्छेद 2 भारत में नए क्षेत्रों को शामिल करता है, अनुच्छेद 3 मौजूदा राज्यों के बदलाव के लिए। ⏳ राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधानसभा से अनुमति मांग सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय संसद का होता है। 🗺️ भारतीय संविधान में संघ और राज्यों के क्षेत्र को संशोधित करने की व्यवस्था संविधान के भाग एक में है। 📚 इतिहास में पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश सीमा समायोजन जैसे उदाहरण संवैधानिक बदलाव की पुष्टि करते हैं। महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि 🏛️ संवैधानिक अधिकार और संतुलन: अनुच्छेद 3 संसद को संघ के भीतर राज्यों के पुनर्गठन पर अधिकार देता है, जो केन्द्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखता है। यह संघीय ढांचे की मजबूती का परिचायक है। ⚖️ विधिगत प्रक्रिया का महत्व: राष्ट्रपति के आदेश से काम नहीं होता, बल्कि संसद के विधायी निर्णय द्वारा राज्यों की सीमा या नाम में परिवर्तन होता है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पुष्टि होती है। 🔄 राज्य सीमाओं का लचीला पुनर्गठन: अनुच्छेद 3 राज्यों की सीमाओं को समायोजित कर सकता है ताकि प्रशासनिक दक्षता, विकास और सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा किया जा सके। 🕰️ इतिहासी दृष्टांत की उपयोगिता: पाकिस्तान विभाजन और बांग्लादेश सीमा समायोजन के उदाहरण दिखाते हैं कि सीमा परिवर्तन संवैधानिक संशोधन के साथ शांतिपूर्ण एवं विधिपूर्वक हो सकता है। 📧 राज्य विधानसभा की भूमिका: राष्ट्रपति संसद को प्रस्ताव भेजने से पहले राज्य विधानसभा की सहमति प्राप्त कर सकता है, जिससे विवाद कम होते हैं और प्रक्रिया में संवाद बढ़ता है। 🏗️ संघीय एकता में अनुच्छेद की भूमिका: राज्य सीमाओं और नामों के परिवर्तन के बावजूद, अनुच्छेद 3 सं���िधान की एकता और अखंडता कायम रखने में मदद करता है।

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